छोटे-मोटे तनाव सभी के जीवन में होते हैं लेकिन कुछ तनाव ऐसे भी हैं जो किसी ट्रॉमा यानि हादसे की वजह से पैदा होते हैं। जीवन में हुए ऐसे हादसे व्यक्ति के दिमाग़ में इतनी गहरी छाप छोड़ते हैं कि उन्हें पोस्ट ट्रॉमा स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसी मानसिक बीमारी हो जाती है। इस डिस्ऑर्डर के बारे में विस्तार से बता रही हैं डॉ कोपल रोहतगी।

पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर क्या है? (What is Post Traumatic Stress Disorder in Hindi)

पोस्ट ट्रामैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर स्ट्रेस डिसऑर्डर तनाव का सबसे ख़तरनाक स्तर है। जीवन में हर कोई छोटे-मोटे तनाव या किसी तरह के ट्रॉमा से ज़रूर जूझता है लेकिन अगर किसी ट्रॉमा के बाद व्यक्ति में उसे लेकर अत्यधिक तनाव दिखता है तो उसे पोस्ट्रामैट्रिक स्ट्रेस डिसऑर्डर कहते हैं। पोस्ट्रामैट्रिक स्ट्रेस डिसऑर्डर यानि पीटीएसडी किसी मामूली ट्रॉमा या इंसिडेंट के कारण नहीं बल्कि किसी भयानक हादसे जैसे कि ऐक्सिडेंट, मर्डर या इस तरह के किसी गंभीर हादसे के कारण होता है। किसी भी ट्रॉमा के बाद व्यक्ति उससे बाहर तो निकल आता है लेकिन कुछ महीनों बाद या कुछ दिनों बाद ही उसे इस तरह का डिसऑर्डर हो सकता है क्योंकि वो उस हादसे की यादों को नहीं भुला पाता।

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मरीज़ में किस तरह के लक्षण दिखते हैं? (Symptoms of PTSD in Hindi)

मरीज़ को उस हादसे के फ्लैशबैक आते हैं जिसके कारण वो डिप्रेशन में भी जा सकता है। मरीज़ का उदास होना, निराश होना, रोना, गुस्सा और चिड़चिड़ापन होना आम बात है। इस तरह के मरीज़ों को ठीक तरह से नींद नहीं आती या फिर नींद पूरी नहीं होती और वह पुरानी यादों के कारण चौंक कर उठ जाता है। यही नहीं घबराहट, बेचैनी, काँपना और पसीने आना जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं। पीटीएसडी में एनिवर्सरी रिएक्शन भी देखा जाता है यानि जिस दिन मरीज़ के साथ वो घटना हुई हो उस दिन के दोबारा आने पर उसे स्ट्रेस डिसऑर्डर होता है।

PTSD

ट्रॉमा के बाद हुए डिसऑर्डर का इलाज कैसे होता है? (Treatment of PTSD in Hindi)

पीटीएसडी से जूझ रहे मरीज़ अपनी प्रॉब्लम किसी के साथ साझा नहीं कर पाते। वे अपने साथ हुए हादसों के बारे में किसी से बात नहीं करते इसलिए ऐसे मरीज़ों को बाद में एनकज़ाइटी डिस्ऑर्डर या डिप्रेशन भी हो जाता है। इसके अलावा मरीज़ अपनी यादों को भुलाने के लिए नशीले पदार्थ भी इस्तेमाल करने लगते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि परिवार और दोस्त किसी तरह के लक्षण दिखने पर मरीज़ को मनोचिकित्सक के पास ले जाएं।  पीटीएसडी के मरीज़ों का इलाज दवाइयों के अलावा बातचीत और समझाने से भी किया जाता है जिसे थेरेपी कहते हैं। मरीज़ को ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने की सलाह भी दी जाती है और साथ ही उन्हें अपने विचार डायरी में लिखने को कहा जाता है ताकि उस पर साइकेट्रिस्ट से चर्चा की जा सके।

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परिवार के लोग कैसे रखें मरीज़ का ध्यान? (How can family members take care of the patient in Hindi)

कभी-कभी पीटीएसडी के मरीज़ इतने परेशान हो जाते हैं कि वो किसी को अपने दिल की बात बताना चाहते हैं चाहे वो उनका हल निकाले या नहीं। परिवार वालों को चाहिए कि वो ऐसे मरीज़ों की बात को बहुत ध्यान से सुने और उन्हें विश्वास दिलाएं कि वो उनकी मदद के लिए हमेशा तैयार खड़े हैं। साथ ही उन्हें समय समय पर साइक्रेटिस्ट और थेरेपिस्ट के पास ज़रूर ले जाएं। इसके अलावा, ऐसे मरीज़ों को भी ये सलाह दी जाती है कि वे हर रोज़ किसी न किसी तरह की ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ जरूर करें और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयों और निर्देशों का सही से पालन करें।

डिसक्लेमर-पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के कारण, लक्षण और इलाज के बारे में लिखा गया यह लेख पूर्णतः डॉ कोपल रोहतगी द्वारा दिए गए साक्षात्कार पर आधारित है।।

Note: This information on PTSD , in Hindi, is based on an extensive interview with Dr Kopal Rohatgi (Psychiatrist) and is aimed at creating awareness. For medical advice, please consult your doctor.